एक कवि लड़ रहा दो मोर्चों पर-लोकतंत्र शर्मिंदा है!! (गिरीश पंकज)

शिल्पकार के मुख से डी. आई. जी. का डंडा महिला पर चलने से एवं कलेक्टर द्वारा मातहत कर्मचारी को थप्पड़ मारने से एक कवि का मन आहत हुआ और आक्रोश से भर उठा. कलम करने लगी  व्यवस्था पर चोट. गिरीश भाई ने आज इस विषय पर एक कविता कही है. तन बुखार से जूझ रहा है और मन दुष्ट... [पूरी पोस्ट]
writer ललित शर्मा

कविता

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[25 Jan 2010 01:37 AM]

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