प्रीति के दोहे
प्रीति हिया ऐसी जगी, भागा भेद-विवेक हर अमूर्त औ' मूर्त में, रुप दृष्टिगत एक रामायण, गीता तुम्ही, तुम ही वेद, पुराण पढूँ, गुनूँ आठो पहर, तुममें ही निर्वाण नेह-सुधा की अब्धि तुम, सुख-माणिक भण्डार डूब डूब चुनता रहूँ, भरूँ हृदय आगार सुबह, तुम्हारी ही हँसी,...
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प्रताप नारायण सिंह
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[25 Jan 2010 00:54 AM]



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