अभिसार जिन्दगी है
संधर्ष न किया तो धिक्कार जिन्दगी हैकाँटों सेज कहकर स्वीकार जिन्दगी हैमिलता सुकूँ हवा से जो तन पे हो पसीनाभूखे की जैसे रोटी अभिसार जिन्दगी हैइन्सानियत की कीमत ईमान की भी कीमतहालात ऐसे लगते व्यापार जिन्दगी हैक्या माँगने से हिस्से का धूप भी मिलेगाहक छीनकर...
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श्यामल सुमन
कविता
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[24 Jan 2010 22:00 PM]



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