केवल एक तुम्हीं हो कारण
सरगम की सीमा ने अपनी सीमा तुम्हें देख कर ,मानीकहा आठवें सुर की संरचना का एक तुम्ही हो कारण रूप न कर पाई वाणी जब सातों सुर लेकर के वर्णितशब्दों के अनथके प्रयासों ने केवल असफ़लता पाईलहरों ने रह रह कर छेड़ी जलतरंग की मधुर रागिनीजो कि तुम्हारे...
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राकेश खंडेलवाल
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[24 Jan 2010 21:22 PM]



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