विकलांगता
लँगड़ी है दादा जी की छड़ी दीवार का सहारा लिए खड़ी है गूँगा है माँ का सितार तहखाने के कोने में उदास पड़ा है अँधी है बाबू जी की ऐनक धूल खाती पुस्तकों की आलमारी में.. ढो रहा हूँ इनका अस्तित्व मैं एकमात्र जीवित उत्तराधिकारी टूटने को तत्पर अपने...
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Udan Tashtari
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[24 Jan 2010 20:00 PM]



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