संस्थाएं नारायण- परायण बनें 9
यदि गांव की संस्थाएं अपने लिए खास सुविधाएं प्राप्त करें और गांव से अलग जैसी दिखने लगें तो संन्यासियों की तरह समाज से बिल्कुल अलग खतरे के सिग्नल जैसी ही दिखेंगी! सेवकों को तो लोकजीवन में एकदम घुल मिल जाना चाहिए।जिस तरह शरीर में आत्मा होती है, उसी तरह...
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अतुल
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[24 Jan 2010 11:10 AM]



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