क्लचर की जगह बांध लो...

चौराहा पलकें खुलते ही / और सुर्ख हो जाते हैं / आंखों के डोरे / याद आती हैं सुबहें / तुम्हारी चाहतों के लाल रंग में रंगी हुई / पता नहीं, कहां से आती है / तुम्हारे हाथ की पकी रोटियों की सोंधी महक/ हर तरफ गूंजती है तुम्हारी हंसी की खनक / बार-बार / तुमने ही क्यों... [पूरी पोस्ट]
writer चण्डीदत्त शुक्ल

कह रहा हूं तुमसे

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[24 Jan 2010 09:46 AM]

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