घुंघरू

कुछ पन्ने मेरी दराज़ से.... कुछ फटी, कुछ उधडी हुई सी मैंकुछ टूटी, कुछ झड़ी हुई सी मैं,आई हूँ गुज़रे वक़्त की इमारत पे.दरवाज़े पे हुई नक्काशी अब कुछ झड सी गयी है,छतों पे जड़े झूमर भी अब कुछटूट गए हैं, कुछ लदक गए हैं.वो सफ़ेद चादरें, जो लाल कालीनकी शोभा बढाया करतीं थीं,अब किसी कोने... [पूरी पोस्ट]
writer ●๋• नीर ஐ

my poems

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[24 Jan 2010 09:32 AM]

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