‘एलीट रद्दी’ की दुर्दशा
एक दौर था जब हम सुबह-सुबह अपने चेहरे के सामने अखबार यूं खोलते थे जैसे कोई हसीना आईना देखती हो। अखबार के पन्ने खड़खड़ाते हुए हमें अपने जागरुक होने का गुमान होता था। सारी दुनिया का जानकारीनुमा टॉनिक हम अल-सुबह गटककर बहसों के लिए पान की दुकानों के अखाड़ों...
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मधुकर राजपूत
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[24 Jan 2010 03:58 AM]



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