अज़ीब शख़्स था, आँखों में ख़्वाब छोड़ गया
अज़ीब शख़्स था, आँखों में ख़्वाब छोड़ गयावो मेरी मेज़ पे, अपनी किताब छोड़ गया नज़र मिली तो अचानक झुका के वो नज़रेंमेरे सवाल के कितने जवाब छोड़ गयापलट के आने का वादा किया था, देने सकूँ मगर वो दिल में, मुसलसल अज़ाब छोड़ गयाउसे पता था, कि तन्हा न रह सकूँगी मैं वो...
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श्रद्धा जैन
Shrddha Jain
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[23 Jan 2010 23:03 PM]



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