नज़रिया

रजनीगन्धा फ़ुटपाथ के बैंच परज़िंदगी के निचोड़ कोछूटे हुए अखबार की तरहछोड़ आए थे,कुछ मेरे विचार थेकुछ तुम्हारी सोचतुम्हारी धारणा थीसमाज को बदलना है,मैं अपनीपरिधि के दायरे कोविकसित करना चाह्ती थी,कल अखबार बारिश में भीगा,आज धूप में सूखा,अब अलावों के बीच सुलग रहा... [पूरी पोस्ट]
writer रजनी भार्गव
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[23 Jan 2010 11:15 AM]

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