...तो लोकतंत्र का खूटां कहलाने का कोई हक नहीं
मीड़िया पर दायित्वों का सही निर्वहन नहीं करने पर हर रोज उंगलियां उठ रही हैं। आलोचना करने वालों में पत्रकारों के अलावा समाज का वह वर्ग भी जो मीड़िया से कभी अपने काले करततूतों के उजागर होने के भय से दहशत में रहता था। ऐसी स्थिति के लिए मीड़िया हर रोज कहीं न...
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EDHAR HAI
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[23 Jan 2010 06:42 AM]



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