एक बेजुबान आक्रोश

नई सोच सारे आक्रोष महज एक दुर्घटना बनकर समाप्त हो जाते हैं। ये आक्रोश भी कुछ ऐसा ही था। गोविन्द निहिलानी की इस फिल्म को देखकर ताजा ताजा बस यही समझ में आता है कि आक्रोश की अपनी असल आवाज उसके सन्नाटे में दबी होती है। मगर अक्सर इस चुप्पी के पीछे जो आक्रोश दबा होता... [पूरी पोस्ट]
writer उमेश पंत

फिल्मों पर

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[23 Jan 2010 03:41 AM]

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