सपना...

भीड़ सेबचने की चाहत लिएसपने में बस गई है अपनी अलग दुनियाहर रात उतरता है सपनाबिस्तर के सिराहनेऔरगुदगुदाता है सुबह तकसब कुछसुहाना होने के अहसास सेअगली सुबहफिर घुस आती है भीड़अपनी गति सेसब कुछ रौंदते हुएऔर नींद के साथटूट जाता हैमेरा सपना भी...!... [पूरी पोस्ट]
writer Neeraj Shrivastava / Hyderabad, Bhopal, India
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[23 Jan 2010 03:10 AM]

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