क्यों अपने रंग रूप का इतना तुझे गरूर है
क्यों अपने रंग रूप का इतना तुझे गरूर हैहै अब जवानी की दोपहरी तो सांझ कितनी दूर हैइक बार सांझ हो गयी तो रात भी घिर आयेगीफिर लाख तूं करना यत्न वो बात न रह पायेगीआँखों से कुछ दिखना नही तो नैन लड़ने किससे हैंमुंह में दांत ही ना होंगे तो हंस के किस को...
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Krishan lal "krishan"
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[23 Jan 2010 02:20 AM]



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