जिगर मुरादाबादी के चन्द शे'र

Kavi Sammelan ज़िन्दगी इक हादिसा है और कैसा हादिसामौत से भी ख़त्म जिसका सिलसिला होता नहींअक्ल बारीक हुई जाती हैरूह तारीक हुई जाती हैकाँटों का भी हक़ है आखिरकौन छुड़ाये अपना दामनइश्क़ जब तक न कर चुके रुसवाआदमी काम का नहीं होतारचयिता : जिगर मुरादाबादीप्रस्तुति : अलबेला... [पूरी पोस्ट]
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शे'र जिगर मुरादाबादी

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[23 Jan 2010 02:09 AM]

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