अपने ही समाज के बीच से निकलती हुई दो-दो लाइनों की कुछ फुलझड़ियाँ-3
कुछ ऐसे भी वीर हैं,भारतवर्ष में आज,जिनकी अम्मा रो रहीं,देख पूत के काज. मलमल का कुर्ता पहिन,घूम रहें हैं गाँव,खबर नही क्या चल रहा,आटा-दाल का भाव.आलस में डूबे हुए,इतने हैं उस्ताद,घर में आते हैं मियाँ,दिन ढलने के बाद. बीड़ी व सिगरेट में,फूँक दिए कुल देह,बेच...
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विनोद कुमार पांडेय
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[23 Jan 2010 01:09 AM]



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