अपने ही समाज के बीच से निकलती हुई दो-दो लाइनों की कुछ फुलझड़ियाँ-3

मुस्कुराते पल-कुछ सच कुछ सपने कुछ ऐसे भी वीर हैं,भारतवर्ष में आज,जिनकी अम्मा रो रहीं,देख पूत के काज. मलमल का कुर्ता पहिन,घूम रहें हैं गाँव,खबर नही क्या चल रहा,आटा-दाल का भाव.आलस में डूबे हुए,इतने हैं उस्ताद,घर में आते हैं मियाँ,दिन ढलने के बाद. बीड़ी व सिगरेट में,फूँक दिए कुल देह,बेच... [पूरी पोस्ट]
writer विनोद कुमार पांडेय
views
20
upvote
5
downvote
0
rating
5
comments
18
[23 Jan 2010 01:09 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix