काश...काश....काश
कई दिनों से लगातार यह महसूस हो रहा था कि आसपास अस्त-व्यस्तता कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। टेबल पर पड़ी हुई कुछ पढ़ी, बे-पढ़ी, अधपढ़ी पत्रिकाएँ, अखबार के कुछ पन्ने, लिखे, अधलिखे कुछ कागज़...अलमारी के हैंडल, कुर्सी की पुश्त और दरवाजे के पीछे लगी खूँटी पर टँगे...
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डॉ. अमिता नीरव
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[23 Jan 2010 00:05 AM]



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