नवगीत: चले श्वास-चौसर पर -संजीव 'सलिल'

संजीव  सलिल  की  रचनाएँ नवगीतसंजीव 'सलिल'चले श्वास-चौसर परआसों का शकुनी नित दाँव.मौन रो रही कोयल कागा हँसकर बोले काँव...*सम्बंधों को अनुबंधों ने बना दिया बाज़ार. प्रतिबंधों के धंधों के आगे दुनिया लाचार.कामनाओं ने भावनाओं को करा दिया नीलाम.बाद को अच्छा माने दुनिया,कहे बुरा... [पूरी पोस्ट]
writer आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

contemporary hindi poetry

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[22 Jan 2010 23:06 PM]

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