इंसानो जैसे दुसरों पर नहीं हंसते बंदर!!
अखबारी कविता-रद्दी पेप्योर से उठाए गए शीर्षक-आशीर्वाद चाहुंगाआक्रामक तेवरनही चलाने देगें टैक्सीसरकार का कोईलेना देना नहीसबसे बड़ी गिरावटइस साल कीएक औरटैक्सी चालक पर हमलाधुमिल होती छविएक्सरसाईज सेपाएं चेहरे मे रौनकये काले दागहटेंगे कैसे?इंसानो जैसे दुसरों...
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ललित शर्मा
कविता
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[22 Jan 2010 20:30 PM]



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