पता नहीं...
पता नहीं कब, कौन, कहाँ किस ओर मिलेकिस साँझ मिले, किस सुबह मिले!!यह राह ज़िन्दगी कीजिससे जिस जगह मिलेहै ठीक वही, बस वही अहाते मेंहदी केजिनके भीतरहै कोई घरबाहर प्रसन्न पीली कनेरबरगद ऊँचा, ज़मीन गीलीमन जिन्हें देख कल्पना करेगा जाने क्या!!तब बैठ एकगम्भीर...
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रंगनाथ सिंह
पता नहीं...
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[22 Jan 2010 08:48 AM]



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