सोच और उसके होने के बीच के लोचे

आवारा बंजारा पता नईं क्यों अक्सर ऐसा होता है कि हम जो पहले से तय करते हैं, उसमें लोचे आ ही जाते हैं। दरअसल सोमवार से यह तय कर के बैठा था कि इस शुक्रवार यानी कि आज अपन अपना साप्ताहिक अवकाश होने की वजह से आराम से बैठेंगे और शब्दों का सफर में चंदू भाई के आत्मकथ्य को... [पूरी पोस्ट]
writer Sanjeet Tripathi

कुछ अपनी

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[22 Jan 2010 08:22 AM]

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