हम किनारे पर भी होते तो भी डूबते सनम
इससे तो अच्छा था नश्तर ही चुभा जाता कोई मरहम लगाये बिन अगर जाना था वापिस यार को बीमार जानता है जब कि मर्ज़ लाइलाज है बेकार है झूठी तसल्ली देना फिर बीमार को गर जीता जाए दिल किसीका हार कर अपना अहमजीत से बेहतर समझ लो ऎसी हसीं हार को माझी ही चाहता ना था कि...
[पूरी पोस्ट]
Krishan lal "krishan"
14
1
0
1
0
[22 Jan 2010 05:53 AM]



Shuffle








