माँ

amitraghat रोज दरीचे खोलकरदेखता हूँ तो नजर आता है एक अक्स उमुमनबाहर आ कर पाता हूँबूढ़ी तुलसी की टकटकी बांधेस्नेहसिक्त आँखेऔर डाल देता हूँएक लोटा रस्मी पानीमुस्कराती है वह तब भीछूता हूँ जब मै उसकेपियराते पत्तेबर्गरेज अभी दूर है चश्मा भूल आया हूँ मेज पर वो रखा है मैं... [पूरी पोस्ट]
writer Amitraghat
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[25 Feb 2009 22:12 PM]

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