परिवर्तन
ज्ञात नहीं क्यूँ कर भूंकते हैंविशाल अट्टालिकाओं में विचरते श्वान दलबनताई - सी निस्तब्धता में पैहमघर लौटते अथक - निरंतर मेहनत करकेथके हरे शराबी पर जिसको नहीं मिलीआज तय की गई उज्रतऔर जो आगे चलकर लड़खड़ा धड़ाम सा गिर पड़ता है तब भी उस अर्ध चेतना में संग्यापराध...
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Amitraghat
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[17 Sep 2008 08:29 AM]



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