माँ
जाड़े की रात्री मैं ठिठुरती - कांपती सूखे पत्र - सी हिलती , उकडूं बैठनिहारती छप्पर को , कहाँ से आती ये हवा सोचती ;पर न दिखा सामने पटविहीन पट जहाँ से प्रवेश करती बेधड़क , निर्लज्ज हवा विशाल अट्टालिकाओं के प्रशस्त उष्ण प्रकोष्ठों से पिटी दिखा रही दादागिरी...
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Amitraghat
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[26 Sep 2008 02:39 AM]



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