सूना जीवन

amitraghat रोज़ के मानिंद आज फ़िर पसरा सन्नाटा है सुनाई देता है बस सन्नाटे का अट्टाहास दिखाई देता है तो बस गहन अन्धकार खिलखिला कर हँसी थी कभी किसी सदी मेरा भी घर था कभी जहाँ एकांत ढूंढे नहीं मिलता था खुशियों का सैलाब बहा करता था घर वही है समाज लोग वही हैं पर सामाजिक... [पूरी पोस्ट]
writer Amitraghat
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[28 Jan 2009 11:11 AM]

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