महंत (लुप्त होते देहाती शब्दों की नाट्य कविता)
जाने कऊन महोत्सव में मदभरी फगुनहट मेंढाक तले आ जुटे अहा! देखो,कुल-छोटे-बड़े-पदहैसियतानुसार- क्रमबद्ध खुरदुरे-ठठाते-चुप्पे-चकमे-बदमस्त बोली कसते भोले-भाले,हज्जार-पानसो-सौ-पच्चास-बीस-दस-पाँच-दोऔर एक के नोट और संग कछु कलदार फिर आगे बढ़-बढ़ हुई जोहारकि खिंच गया...
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Amitraghat
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[04 Oct 2009 13:27 PM]



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