अब बोझा उतार दो एटलस!!

शिल्पकार के मुख से बसंतागमनजुझ रही हैं कोहरे से सुर्यकुमारियाँ किसी मजदुर की तरह एक जुन की रोटी के लिए बोझा ढोता एटलसपृथ्वी का भारकांधे  पर लादेचलता है अनवरतभुख मिटाने के लिएपर्चे बांटे जा रहे हैंबाजार मेभुख मिटाने वालासल्युशन बनकर हैतैयारअब बोझा... [पूरी पोस्ट]
writer ललित शर्मा

कविता

views
36
upvote
3
downvote
0
rating
3
comments
15
[21 Jan 2010 21:41 PM]

Free Vedic Astrology From Astrobix