अब बोझा उतार दो एटलस!!
बसंतागमनजुझ रही हैं कोहरे से सुर्यकुमारियाँ किसी मजदुर की तरह एक जुन की रोटी के लिए बोझा ढोता एटलसपृथ्वी का भारकांधे पर लादेचलता है अनवरतभुख मिटाने के लिएपर्चे बांटे जा रहे हैंबाजार मेभुख मिटाने वालासल्युशन बनकर हैतैयारअब बोझा...
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ललित शर्मा
कविता
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[21 Jan 2010 21:41 PM]



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