तपती दोपहर का बूढा नीम

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति जून की एक दोपहर थी या दोपहर भरी एक जून .....नहीं शायद गर्मी की एक दोपहर । निमोरियों से नीम भरा हुआ उस तपती दोपहर को खड़ा खड़ा देख रहा था । पकी-अधपकी निमोरियाँ, कुछ जमीन पर और कुछ नीम पर झूल रही थीं ।इस सुस्त छुट्टी भरी दोपहर को काटना उतना मुस्किल न था... [पूरी पोस्ट]
writer अनिल कान्त :

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[21 Jan 2010 08:04 AM]

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