क्या कोई द्वार खोलेगा
अन्तर्मन की गहराईयों में
अन्धकार से लिपटा
चेतना से परे
किसी किरण की चाह में
भटकता हूं मैं
क्या कोई द्वार खोलेगा सर्वत्र शांति व्याप्त
कोई कोलाहल नहीं
न पथ, न पथदर्शक
धैर्य क्यों न डोलेगा मन से जिन्हें जोडा था
थाम हाथ, रक्तिम हो
रम गये किरचन बन नस नस में...
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मोहिन्दर कुमार
कविता
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[20 Jan 2010 23:30 PM]



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