क्या कोई द्वार खोलेगा

दिल का दर्पण -  परावर्तन अन्तर्मन की गहराईयों में अन्धकार से लिपटा चेतना से परे किसी किरण की चाह में भटकता हूं मैं क्या कोई द्वार खोलेगा सर्वत्र शांति व्याप्त कोई कोलाहल नहीं न पथ, न पथदर्शक धैर्य क्यों न डोलेगा मन से जिन्हें जोडा था थाम हाथ, रक्तिम हो रम गये किरचन बन नस नस में... [पूरी पोस्ट]
writer मोहिन्दर कुमार

कविता

views
18
upvote
2
downvote
0
rating
2
comments
1
[20 Jan 2010 23:30 PM]

Free Vedic Astrology From Astrobix