खुशबू
इक नयी खुशबू कहाँ से पास मेरे आ गयीसोच की धारा बदलकर जिन्दगी में छा गयीरोज मिलते जो हजारों लोग कितने याद हैंआँख से उतरा हृदय में प्रीत मुझको भा गयीफिर मेरी मुस्कान लौटे था यकीं ऐसा कहाँस्निग्ध सी मुस्कान जैसे भ्रम के गम को खा गयीकुछ न कुछ तो शेष रहतीं...
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श्यामल सुमन
कविता
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[20 Jan 2010 19:38 PM]



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