शीत ऋतू की त्रिप्दि

साहित्य सर्जक अब धूप नही आतीसूरज को उलहना हैउस को वः सताती हैक्या वो अनजानी हैये हो ही नही सकतासर्दी तो रानी हैजब हाथ ठिठुरते हैंटीबी मन के अलावों मेंदिल भी तो जलते हैंये आग तो धीमी हैदिल और जलाओ तोये धूप ही सीलीहैवो महल अटारी सेक्यों निचे नही आतीसूरज की थाली सेकुछ भी... [पूरी पोस्ट]
writer vedvyathit
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[09 Jan 2010 08:09 AM]

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