ग़ज़ल
ये इश्क का अजगर ,निगल गया लाखों ,मगर , कमी न आयी , कहीं दीवानों मे !बिन जले समझा है ,न कोई समझेगा ,कैसा जनून है , मरने का परवानो मे !अजब ये आग है ठंडी, धुआं नहीं करती ,मज़ा आता है बस , जलने जलाने मे !बीमारे इशक को, दरवेश कहूं या दीवाना ,शिवरी को उम्र लगी...
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sanjeev kuralia
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[19 Jan 2010 12:21 PM]



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