तलाश
बसंती ब्यार सा,खिले पुष्प सा,उस अनदेखे साए ने..भरा दिल को..प्रीत की गहराई से,खाली सा मेरा मन,गुम हुआ हर पल उस मेंऔर झूठे भ्रम कोसच समझता रहा ..मृगतृष्णा बना यह जीवनभटकता रहा न जाने किन राहों परह्रदय में लिए झरना अपार स्नेह का यूं ही निर्झर बहता रहा,प्यास...
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रंजना [रंजू भाटिया]
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[18 Jan 2010 23:27 PM]



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