अब् मुस्कान् कहाँ आ पाये

गीतकार की कलम परिणति, जलते हुए तवे पर गिरी हुई पानी की बूँदेमन की आशा जब यथार्थ की धरती से आकर टकरायेअपने टूटे सपनों की अर्थी अपने कांधे पर ढोतेएकाकीपन के श्मशानों तक रोजाना ले जाते हैंचुनते रहते हैं पंखुरियां मुरझा गिरे हुए फूलों कीजो डाली पर अंगड़ाई लेने से पहले झर... [पूरी पोस्ट]
writer राकेश खंडेलवाल
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[18 Jan 2010 21:13 PM]

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