लिए फूल पत्थर के ताजिर मिले, चमन आज फिर बदगुमाँ हो गया
मेरा चाँद आगोश में झुक गया कि नीचा बहुत आसमाँ हो गया न इजहार हम से हुआ न मनाही नजर से इश्क खुद बयाँ हो गया गुलों तितलियों से कभी खुश हुआ बटुक वो सखी बागबाँ हो गया सितम पर सितम इस कदर कर गए रहम पर खुदा बेजुबाँ हो गया मिटा कौम पर दे के गम पुरनमीबचा रंज जो...
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प्रकाश पाखी
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[18 Jan 2010 13:36 PM]



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