इंसान की बुनियाद-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (insan ki buniyad-hindi vyangya kavitaen)
शहर को बढ़ते देखासड़कों को सिकुड़ते देखा,इंसानों की जिंदगी मेंबढ़ते हुए दर्द के साथहमदर्दी को कम होते देखा।.......................आसमान छूने की चाहत मेंकई लोगों को जमीन परऔंधे मुंह गिरते देखा,बार बार खाया धोखाफिर भी हर नये ठग कीचालों में उनको घिरते...
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दीपक भारतदीप
शायरी
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[18 Jan 2010 11:52 AM]



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