तेरे लब कहां हैं, ओढ़ ले मेरी मुस्कान
मैंने दीं अश्कों से नम शामें / तुमने खिलखिलाहटों से भरी सुबहें / मैं काला हुआ, चीखता ही रहा / तुम गुलाबी रहीं, कभी ना मद्धम हुईं / नादां था, हरदम भटकता रहा / अब जो तुम...नासाज़ हो---नाराज़ हो / पछता रहा हूं/ यकीन मानो / छीजता ही जा रहा...
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चण्डीदत्त शुक्ल
सिर्फ तेरे लिए...
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[18 Jan 2010 09:02 AM]



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