ग़ज़ल

KALAM KA KARAZ हर हालात को , पुख्ता हल की ज़रुरत है !फ़ेसला तय है , क्या कल की ज़रुरत है !तंगिए दौर , पुर जोर बुलंदी पे है इब्ला ,आवाम को , बस हलचल की ज़रुरत है !इल्म भरपूर है सबको, अमल से परहेज़,मशरूफ नज़रों को ,फुर्सत की ज़रुरत है !रहवर खुद भटके हुए , रास्ता बता रहे... [पूरी पोस्ट]
writer sanjeev kuralia

ग़ज़ल

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[18 Jan 2010 07:49 AM]

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