तू कवि है तेरे घाव कैसे भर पाएंगे
तू कवि है तेरे घाव कैसे भर पाएंगेटूटे रिश्ते बिखरे सम्बंध मांग रहे हैं जीवन की परिभाषाउनके आकुल होठ नहीं समझते मेरे नयनों की भाषास्याह रात की खामोश उदासी लगती सदा आंसू झेलती उसकी पीड़ा से छोटा लगता विंध्याचल का आंचल जब भूख देती है दलीलें तो दर्द कैसे समझ...
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चेतना के स्वर
कविता
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[18 Jan 2010 04:17 AM]



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