ज्योति बाबू.....यू आर इन माई हार्ट.....
उम्मीद तो ख़ामोशी से अपना दामन समेटे कब की जा चुकी थी. फिर भी एक आस जो दिल के गोशे में कहीं सिमटी हुयी थी, आज खामोशी से दम तोड़ गयी. इंसान कितना मजबूर हो जाता है कुदरत के आगे, चुपचाप उसके दिए हुए हर गम कुबूल कर लेना मजबूरी ही तो है.दिल तो सुबह से उदास था,...
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rakhshanda
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[18 Jan 2010 02:59 AM]



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