ऐ दुनिया तेरे कितने रंग ...
यह मेरी और मेरी मित्र वंदना की सांझी नज़्म है....सच होता निलाम देखूं ...या झूठ के लगते दाम देखूंऐ दुनिया तेरे कितने रंग मैं क्या देखूं क्या न देखूधर्म पे लगते बाजार देखूं ,संक्रमण सा फैला भ्रस्टाचार...
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●๋• नीर ஐ
my poems
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[17 Jan 2010 22:41 PM]



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