किनारा लगाते रहे

मनोरमा मैं भी हँसता रहा वो हँसाते रहेदिल की आपस में दूरी बढ़ाते रहेन तो पीने को पानी न आँखों में हैइसलिए आँसुओं से नहाते रहेजब जरूरत पड़ी साथ मुझको लियावक्त बदला किनारा लगाते रहेहाथ मिलते रहे, बेरूखी आँख मेंवो मशीनों सा बस मुस्कुराते रहेजिसने लूटा चमन, बागबां... [पूरी पोस्ट]
writer श्यामल सुमन

कविता

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[17 Jan 2010 21:43 PM]

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