घर में सूबेदारनी के क्या दिवाली फाग क्या

पाल ले इक रोग नादां जिंदगी के वास्ते... कई दिनों से अपनी कोई ग़ज़ल नहीं लगायी थी मैंने ब्लौग पर, तो आज मूड-सा बना ग़ज़ल का। पुरानी ग़ज़ल है, जिसे शायद कुछ सुधि पाठकों ने कोलकाता से निकलने वाली मासिक पत्रिका वागर्थ के अक्टूबर 09 वाले अंक में पढ़ा होगा और कुछ पाठकों ने साहित्य-शिल्पी पर भी पढ़ा होगा। एक... [पूरी पोस्ट]
writer गौतम राजरिशी

ग़ज़ल

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[17 Jan 2010 20:00 PM]

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