दिसम्बर की सर्दी में तेरा जाना, यार..उपेन… कुछ जँचा नहीं
दिसम्बर की सर्दी में तेरा जाना, यार..उपेन… कुछ जँचाये भिन्न-भिन्न बोलियाँ / ये लाठियाँ, ये गोलियाँयह उपेन्द्र मिश्र की कविता की पंक्तियाँ हैं। उपेन्द्र मिश्र मुझसे तक़रीबन चौदह-पन्द्रह बरस बड़ा था। लेकिन हमारी मित्रता में उम्र कभी आड़े नहीं आयी। हम जब भी...
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srdhanjali
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[17 Jan 2010 06:41 AM]



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