जनाब सरवर साहब की गज़लें
ग़ज़ल ०१ मंज़िले-दर्द से गुज़र आए आज अपने किए को भर आए ! था क़ियामत निगाह का मिलना आँख से दिल में वह उतर आए ! आज याद आई उसकी यूँ जैसे सुबह का भूला शाम घर आए ! ना-तवानी से ना-तवानी है ग़म उठाते हुए भी डर आए ! हम अगर काम से गये तो क्या ? आप तो अपना काम कर आए !...
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आनन्द पाठक
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[26 Dec 2009 05:06 AM]



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