जनाब सरवर साहब की ग़ज़ल
ग़ज़ल ०२ बात ऐसी हुई है क्या साहेब ? हो गए आप क्यों ख़फ़ा साहेब? कुछ तो कहिए कहाँ कि ये आखिर लग गई आप को हवा साहेब ? ख़ामशी और ऐसी खामोशी ! कब मुहब्बत में है रवा साहेब ? हाय यह कैसी बे-नियाज़ी है ? रंगे-हस्ती बिखर गया साहेब क्या कोई मुझसे बद गुमानी है ? तौबा...
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आनन्द पाठक
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[26 Dec 2009 05:09 AM]



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