जनाब सरवर की गज़लें
ग़ज़ल ०३ दिल ही दिल में डरता हूँ कुछ तुझे ना हो जाए वरना राह-ए-उल्फ़त में जाए जान तो जाए मेरी कम नसीबी का हाल पूछते क्या हो जैसे अपने ही घर में राह कोई खो जाए गर तुम्हे तकल्लुफ़ है मेरे पास आने में ख़्वाब में चले आओ यूँ ही बात हो जाए झूठ मुस्कराए क्या आओ मिल...
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आनन्द पाठक
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[03 Jan 2010 08:20 AM]



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