जनाब सरवर की ग़ज़ल 04
ग़ज़ल ०४ दिल दुखाए कभी ,जाँ जलाए कभी, हर तरह आज़माए तो मैं क्या करूँ ? मैं उसे याद करता रहूँ हर घड़ी , वो मुझे भूल जाए तो मैं क्या करूँ ? हाले-दिल गर कहूँ मैं तो किस से कहूँ,और ज़बाँ बन्द रखूँ तो क्यों कर जियूँ ? यह शबे-इम्तिहां और यह सोज़े-दुरूं ,खिरमने-दिल...
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आनन्द पाठक
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[09 Jan 2010 02:50 AM]



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